=>> हे सदगुरु परमात्मा -वैराग्य ज्ञान और मोक्ष पर कृपया प्रकाश डाले ?
=>> प्रिय आत्मन बिना विवेक वैराग्य नाही। वैराग्य बिना नहीं ज्ञान और ज्ञान बिना मोक्ष असंभव जानो। जिस क्षण तुम्हे शरीर की नश्वरता का पता चल जाए उसी क्षण वैराग्य प्रगट हो जाएगा। वैराग्य ज्ञान का प्रमुख साधन है। जब डॉक्टरने निदान किया की तुम्हे केन्सर है। वो तीसरे स्टेज में है। आप ज्यादा दीन जीने वाले नहीं हो। उस दिन तुम्हे संपदा में से रस उठ जाएगा। यह सब किया कराया छुटने वाला है। अब आप कुछ नहीं कर सकते, क्योकि बाजी हाथ से छुटने वाली है रुग्ण चितवाला इन्सान ज्ञान का अधिकारी नहीं हो सकता। मानसिक संतुलन जरुरी है। मानसिक बिमारी के लिए तुम्हे संत सानिध्य और सत्संग सुनना आवश्यक जानो। दूसरा इलाज है ही नहीं। सदगुरु कृपा द्रष्टि से तुम्हे सही जीवन मिल सकता है। जिसने परम सत्य का रहस्य पाया है। उसे संत कहते हे। संत और सत्य में कोई अंतर नहीं है। जिस दिन सारी कामनाये विलीन हो जाती है। उसी दिन असली संन्यास प्रगट होता है। आत्म संतुष्ट पुरुष के लिए बाहरी भौतिक चीजो से कोई लेना देना नहीं है, जैसे पक्का फल पेड़ से अपने आप गिर जाता है। एसे ही ज्ञानी पकड़ने और छोड़ने की कल्पना से मुक्त हो जाता है। जीवन मुक्त पुरुष सुखी लकडी की तरह होता है। हरी लकड़ी जलाओगे तो धुआ निकलता है। आसपास रहनेवालो को भी पता चल जाएगा की क्या हो रहा है। स्वरूप ज्ञान बिना मुक्त होना अशंभव जानो। अरे ज्ञानी को तो मोक्ष पाने की भी इच्छा बचाती ही नहीं फिर भी वो सदा मुक्त है।त्याग का त्याग उसे संन्यास कहते है। जिसका कर्तृत्वभाव विलीन हो गया हो, उसे सच्चा सन्यासी कहते है। जिसकी देहाध्यास की जड़ें उखड गई हो। वो मृत्यु से पर हो जाएगा। देहाध्यास का जन्म अज्ञान से होता है। और स्वरूप ज्ञान होने से देहाध्यास तिरोहित होता है। ये सदगुरु की दृष्टी का करिश्मा जानो। ज्ञानी की दृष्टी में जगत है ही नहीं। यह शरीर ढूढ़ना मुश्किल हो जाएगा, शरीर नहीं है तो मृत्यु किसको आएगी, मृत्यु स्वभाव से है ही नहीं तो डर भला कैसे होगा? जागृति ही मोक्ष जानो।
=>> प्रिय आत्मन बिना विवेक वैराग्य नाही। वैराग्य बिना नहीं ज्ञान और ज्ञान बिना मोक्ष असंभव जानो। जिस क्षण तुम्हे शरीर की नश्वरता का पता चल जाए उसी क्षण वैराग्य प्रगट हो जाएगा। वैराग्य ज्ञान का प्रमुख साधन है। जब डॉक्टरने निदान किया की तुम्हे केन्सर है। वो तीसरे स्टेज में है। आप ज्यादा दीन जीने वाले नहीं हो। उस दिन तुम्हे संपदा में से रस उठ जाएगा। यह सब किया कराया छुटने वाला है। अब आप कुछ नहीं कर सकते, क्योकि बाजी हाथ से छुटने वाली है रुग्ण चितवाला इन्सान ज्ञान का अधिकारी नहीं हो सकता। मानसिक संतुलन जरुरी है। मानसिक बिमारी के लिए तुम्हे संत सानिध्य और सत्संग सुनना आवश्यक जानो। दूसरा इलाज है ही नहीं। सदगुरु कृपा द्रष्टि से तुम्हे सही जीवन मिल सकता है। जिसने परम सत्य का रहस्य पाया है। उसे संत कहते हे। संत और सत्य में कोई अंतर नहीं है। जिस दिन सारी कामनाये विलीन हो जाती है। उसी दिन असली संन्यास प्रगट होता है। आत्म संतुष्ट पुरुष के लिए बाहरी भौतिक चीजो से कोई लेना देना नहीं है, जैसे पक्का फल पेड़ से अपने आप गिर जाता है। एसे ही ज्ञानी पकड़ने और छोड़ने की कल्पना से मुक्त हो जाता है। जीवन मुक्त पुरुष सुखी लकडी की तरह होता है। हरी लकड़ी जलाओगे तो धुआ निकलता है। आसपास रहनेवालो को भी पता चल जाएगा की क्या हो रहा है। स्वरूप ज्ञान बिना मुक्त होना अशंभव जानो। अरे ज्ञानी को तो मोक्ष पाने की भी इच्छा बचाती ही नहीं फिर भी वो सदा मुक्त है।त्याग का त्याग उसे संन्यास कहते है। जिसका कर्तृत्वभाव विलीन हो गया हो, उसे सच्चा सन्यासी कहते है। जिसकी देहाध्यास की जड़ें उखड गई हो। वो मृत्यु से पर हो जाएगा। देहाध्यास का जन्म अज्ञान से होता है। और स्वरूप ज्ञान होने से देहाध्यास तिरोहित होता है। ये सदगुरु की दृष्टी का करिश्मा जानो। ज्ञानी की दृष्टी में जगत है ही नहीं। यह शरीर ढूढ़ना मुश्किल हो जाएगा, शरीर नहीं है तो मृत्यु किसको आएगी, मृत्यु स्वभाव से है ही नहीं तो डर भला कैसे होगा? जागृति ही मोक्ष जानो।