Jay Ambe

ज्ञान के सूत्र

(१) दुसरे पर अंगुली उठानेवाला आदमी आज़ाद नहीं हो सकता ।

(२ ) तुम्हारे व्यक्तित्व का गवाह तुम्हारी वाणी है ।

(३) खुद को सुननेवाला आदमी सच्चा जीवन पता है ।

(४) तुम्हारी मंजिल चुने हुए सही रस्तेपर निर्भर है ।

(५) क्षमा संत पुरुष का भूषण है । करुणा स्वभाव है ।

(६) दुसरो के दू:ख पर उत्सव माननेवाला आदमी भक्त नहीं हो सकता ।

(७) स्वीकृति पूर्णता की निशानी है ।

(८) मन की बीमारी का इलाज केवल सत्संग है ।

(९) प्रेम और घृणा दोनों एक साथ नहीं रह सकते ।

(१०) नफ़रत की आग प्रेम के पानी से बूजाई जा सकती है ।

(११) विजयी होना सरल है । हारना मुस्किल है । हारा हुआ आदमी विजयी होता है ।

(१२) खोजनेवाला आदमी भटक जाता है । खुद में खोना परम सन्ति का धाम है ।

(१३) अशांति की भ्रांति मिटाना शांति का उपाय है ।

(१४) अपनी मुर्खता का ज्ञान ही सच्ची सर्वज्ञता की निशानी है ।

(१५) जिसकी दृष्टी में प्रेम है,वह सदा निरोगी है ।

(१६) इष्ट में दोष देखनेवाला और इष्ट की निंदा सुननेवाला आदमी समर्पित नहीं हो सकता ।

(१७) मीठा खाने वाली जिह्वा मीठा बोलने से मधुर लगती है। मधुर वाणी श्रेष्ठ भूषण है ।

(१८) बिना संतोष विश्राम नहि । संतोष धन अनमोल, "पूरण" तृष्णा अभागिनी हरी से न हुआ मेल ।।


इश्वर की भेट इन्सानियत

=>> आदमी हर चीज का बटवारा कर सकता है। लेकिन इन्सानियत का बटवारा करना असंभव है। आज तक किसीने किया ही नहीं।
=>> इन्सानियत परमात्मा की दी हुई सबसे अच्छी और सच्ची दौलत है। धर्म,पंथ,सम्प्रदाय और ग्रंथ का हम आदर करते है। फिर भी जहाँ इन्सानियत नहीं है वहां इन सब का कोई मुल्य नहीं है। इन्सान उसे कहते है,जिस के दिल में रहेम,प्रेम और धर्म है उसे हम इन्सान के रूप में परमात्मा को देखते है। जिसने अपने भीतर प्रेम पाया है वो दूसरो को बाट सकता है। जिसका जीवन दूसरो के लिए है। जैसे मोमबत्ती जलकर दूसरो को रोशनी देती है।
=>> हम तुम्हारी पास खाली जोली लेके खड़े है। धन-दौलत हमें नहीं चाहिए। आपसे हो सके तो थोडासा प्रेम हमारी जोली में डालो। हमें और कोई दूसरी उम्मीद नहीं है। इस दुनिया में कोई बुरा है ही नहीं। यह हमारी दृष्टी है।धृणा हम कैसे कर सकते है, जो की वो हमारे बस की बात ही नहीं है। प्रेम इन्सान का स्वभाव है। इन्सान हर किसी को प्रेम करे वो अच्छी बात है लेकिन हर चीज में प्रेम पाना भक्ति की पराकाष्ठा जानो।
=>> जिसके दिल में ज्ञान की रोशनी प्रगट हो जाये उसे हम संत कहते है। सबको एक केंद्र पर लाना संत का उदेश जानो, वो अपनी रोटी पकाने के लिए तोड़ने की कोशिश नहीं करता। टूटे हुए दिल को जोड़ना संत का धर्म है। हरदिल में परमात्मा रहता है। अगर मंदिर टूट जाए,मस्जिद टूट जाए तो तुम फिर से खड़ा कर सकते है।अगर किसीका भी दिल टूट जाए तो तुम परमात्मा को कहाँ बिठाओगे ये तुम्हारा बचपना है। मंदिर,मस्जिद,मठ,चर्च में से प्रेम की बास आनि चाहिए,नहीं की घृणा की बदबू। 
=>> अब तक कुछ बिगड़ा नहीं है।आओ मिले,कंधे से कंधो मिलाइए,फिर से एक नई दुनिया का निर्माण करेंगे। वहां प्रेम की रोशनी,आनंद के कुवारे,क्षमा  और रहेम से हम हमारे जीवन को सवारेगे। 
=>> तुम्हारा सोया हुआ जमीर जाग जाएगा। यह हमारी आखरी उम्मीद है। मुझे मेरे पर पूरा भरोसा है। हमारी उम्मीद है की हमारा विस्वास का आप आदर करोगे ये हमारा विश्वास है। विश्वास है तो जीवन है विशवास है तो सब कुछ है सब को मेरा कोटि कोटि प्रणाम।

वैराग्य ज्ञान और मोक्ष

=>> हे सदगुरु परमात्मा -वैराग्य ज्ञान और मोक्ष पर कृपया प्रकाश डाले ? 
=>> प्रिय आत्मन बिना विवेक वैराग्य नाही। वैराग्य बिना नहीं ज्ञान और ज्ञान बिना मोक्ष असंभव जानो। जिस क्षण तुम्हे शरीर की नश्वरता का पता चल जाए उसी क्षण वैराग्य प्रगट हो जाएगा। वैराग्य ज्ञान का प्रमुख साधन है। जब डॉक्टरने निदान किया की तुम्हे केन्सर है। वो तीसरे स्टेज में है। आप ज्यादा दीन जीने वाले नहीं हो। उस दिन तुम्हे संपदा में से रस उठ जाएगा। यह सब किया कराया छुटने वाला है। अब आप कुछ नहीं कर सकते, क्योकि बाजी हाथ से छुटने वाली है रुग्ण चितवाला इन्सान ज्ञान का अधिकारी नहीं हो सकता। मानसिक संतुलन जरुरी है। मानसिक बिमारी के लिए तुम्हे संत सानिध्य और सत्संग सुनना आवश्यक जानो। दूसरा इलाज है ही नहीं। सदगुरु कृपा द्रष्टि से तुम्हे सही जीवन मिल सकता है। जिसने परम सत्य का रहस्य पाया है। उसे संत कहते हे। संत और सत्य में कोई अंतर नहीं है। जिस दिन सारी कामनाये विलीन हो जाती है। उसी दिन असली संन्यास प्रगट होता है। आत्म संतुष्ट पुरुष के लिए बाहरी भौतिक चीजो से कोई लेना देना नहीं है, जैसे पक्का फल पेड़ से अपने आप गिर जाता है। एसे ही ज्ञानी पकड़ने और छोड़ने की कल्पना से मुक्त हो जाता है। जीवन मुक्त पुरुष सुखी लकडी की तरह होता है। हरी लकड़ी जलाओगे तो धुआ निकलता है। आसपास रहनेवालो को भी पता चल जाएगा की क्या हो रहा है। स्वरूप ज्ञान बिना मुक्त होना अशंभव जानो। अरे ज्ञानी को तो मोक्ष पाने की भी इच्छा बचाती ही नहीं फिर भी वो सदा मुक्त है।त्याग का त्याग उसे संन्यास कहते है। जिसका कर्तृत्वभाव विलीन हो गया हो, उसे सच्चा सन्यासी कहते है। जिसकी देहाध्यास की जड़ें उखड गई हो। वो मृत्यु से पर हो जाएगा। देहाध्यास का जन्म अज्ञान से होता है। और स्वरूप ज्ञान होने से देहाध्यास तिरोहित होता है। ये सदगुरु की दृष्टी का करिश्मा जानो। ज्ञानी की दृष्टी में जगत है ही नहीं। यह शरीर ढूढ़ना मुश्किल हो जाएगा, शरीर नहीं है तो मृत्यु किसको आएगी, मृत्यु स्वभाव से है ही नहीं तो डर भला कैसे होगा? जागृति ही मोक्ष जानो।

माय चेलेन्ज

=>> प्रिय आत्मन तुम भीतर से खाली होकर हमारे सामने बैठकर हमार शब्द में लक्ष्य लेने से तुम तुम्हारे सही मुकाम पर पहुच सकते है। ऐ हमारा पक्का वादा है। युक्ति सहित हम तुम्हे तुम्हारे अंतिम लक्ष्य तक पहुचाएंगे। हम तुम्हे ऐसी जगह खड़ा कर देंगे की सवाल बचेगा ही नहीं। सवाल क्यों होता है? समाधान क्या है ? उस रहस्य को पाना है। सारी समस्या की जड़े हम उखाड़ के फेक देंगे। संशय मुक्त होना ही सही जीवन जानो? हम कोई पंथ संप्रदाय की बात नहीं करेंगे। व्यक्ति विशेष धर्म की सीमा से आपको ऊपर उठना है।मै इसाई,मुस्लिम,बौध,हिन्दू ,जैन धर्म की बात नहीं करेंगे। तुम्हारा धर्म क्या है ? जिस धर्म तुम्हारा रक्षक हो। जाय उस धर्म की हम बात करते है। कुछ करना नहीं है। कुछ पाना नहीं है सिर्फ अपने को जानो सम्पक ज्ञान धर्म पंथ सम्प्रदाय की सीमा से बाहर जानो। ज्ञान पवित्र और स्वतंत्र है। आप स्वभाव से स्वतंत्र है। और रहेंगे। फिर भी धर्माचार्यो ने आपके सरपे कर्म का भारी बोज रख दिया है। आप उठाने पायेंगे। आपको निर्बल बना दिया है। तुम्हारी पंखे मरोड़ दी है आप अनंत की यात्रा कैसे कर पायेंगे। आपको निर्मल बना दिया है। तुम्हारी पंखे मरोड़ दी है आप अनंत की यात्रा कैसे कर पाएंगे। निर्मल मन श्रध्धा युक्त प्रेम से हमारा शरण ही तुम्हारा जीवन है। गुरु परंपरा से मिला हुआ ही ज्ञान हम तुम्हे प्रदान करेंगे।ज्ञान ही गुरु जानो। हम अगम्य अगोचर मन वाणी का विषय नहीं है। उस ज्ञान की चरमसीमा तक पहुचाएंगे। सारे पिंड ब्रह्मांड और तुम्हारी बुध्धि सिमित  है। हमारी प्रज्ञा असीम और अमाप जानो। ऐ हमारा अहंकार है। ऐसा मत समजो ऐ हमारे भीतर की असली आवाज जानो। ऐ आवाज अगर आपके हदय में उत्तर जाय तब तुम्हे हमारे पर श्रध्धा और विश्वास करेंगे। इसमें कोई शक नहीं है। हम तुम्हे मिटाके ही रहेंगे मिटाना हमारा पैसा है। तुम हमारे पास आओ फिर वापस लौटना असंभव जैसे पानी के ग्लास में तुम सक्कर डालेंगे। एक घंटे बाद निकालना मुश्किल हो जाएगा क्योकि शक्कर पानी के साथ गुलमिल गई ऐसे तुम्हारी चेतना जब व्यापक हो जाय तब तुम कहा हो ? कहा तक हो ? वो सारे सवाल गिर जायेंगे। मौन भाषा तुम्हारी मंजिल हो जायेगी। चुप्पिमें अस्तित्व का राज पा शकेंगे।

हरी ही नाद नाद ही हरी

 =>>  यह सूत्र बड़ा गहन है। इसका रहस्य जानने के लिए सदगुरु की कृपा आवश्यक है। कर्म उपासना याने ग्रंथ पढ़ने से नहीं पाया जाता। नादी और नाद का अंतर तुटने पर तुम पूर्णता को उपलब्ध हो सकते हो। जो सुनाई पड़ता है। उसीमे सुननेवाला समा जाता है। इस असली नाद को सुनने के लिए इन्द्रिय काम आनेवाली नहीं है। बुध्धिगम्य नहीं है। में जिस नाद की बात कर रहा है वो नाद  विश्व का आधार जानो उस नाद निमित हो कर अनंत ब्रह्मांड की रचना करता है। और उपादान कारण भी नाद है। ओमकार की उत्तपति स्थान भी वो नाद है। उस नाद को हम अस्तित्व कहते है। वो स्वयं है न उसकी उत्त्पति है। न स्थिति है और न उसी का अंत है। वो कभी कुछ हुआ ही नहीं और होनेवाला भी नहीं,अपरिणामी अखंड और अद्वेत जानो। वो नाद अनंत रुपसे से भासित होने पर भी अपने महिमा में यथार्थ रूप से स्थित है। सर्वरूप और सर्व से पर इस नाद का असली स्वरूप जानो। उस नाद को पाना नहीं है। तुम इस नाद का हिस्सा हो। आप का वियोग हुआ ही नहीं योग कैसे किया जाय ? आप योगी है और रहेंगे। इस नाद को अनंत नाम से पुकारा जाता है। ब्रम्ह,इश्वर,चैतन्य ,अस्तित्व,ओमकार आनंद सत्य सारे विशेषण उसीका जानो।उस नाद से ऐकोहम बहुश्याम संकल्प से अनंत ब्रह्मांड के रूप में प्रगट हुआ हो। ऐसा श्रुति प्रमाण जानो। उस नाद का वरन करता है। उसी के सामने यथार्थ रूपसे प्रगट हो जाता है। सदगुरु एक माध्यम है। उसके सिवा आप इस रहस्य को पाना बड़ा मुश्किल जानो। आखिरी रहस्य पाने से तुम और सदगुरु नाद के रूप में दिखाई पडते है। ऐ है जीवन का अंतिम लक्ष्य उसके आगे जानने के लिए कुछ,शेष बचता ही नहीं उसे हम पूर्ण दर्शन कहते है।
=>> सदगुरु कृपा ही केवलम। 

मिथ्या का रहस्य

=>> प्रिय आत्मन,मैंने एक कहानी सुनी है वो आपके सामने रखता है। गौर से पढ़ना एक फ़क़ीर बार बार एक ही बात करता था। ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या। फ़क़ीर की बात लोगो को जचती नहीं थी। क्योकि सब अपनी धारणा में बध्ध थे। ये बात बादशाह तक,पहुच गई। बादशाह ने फ़क़ीर को अपने दरबार में बुलाया। बादशाह भी फ़क़ीर की बातो से सहमत नहीं था। फ़क़ीर को सवाल किया। जगत सत्य है। या मिथ्या ? फ़क़ीर ने बोलो जगत मिथ्या है। दो तिन बार दोहराया सवाल लेकिन फ़क़ीर एक ही उत्तर दे रहा था।की जगत मिथ्या है बादशाह ने फरमान किया की इस फ़क़ीर को मृत्युदंड दिया जाय। हाथी के पैरो तले कुचल दो। दरबार के अन्दर हाथी लाया गया।फिर से बादशाह ने बोल  की जगत सत्य है ऐसा बोल दे। अभी तू मुक्त हो सकता है। ये आखरी मौक़ा है। फ़क़ीर अपनी बात पर अडिग रहा। जगत मिथ्या है बादशाह ने महावत को इशारा किया। हाथी को छोड़ दिया जाय हाथि ने अपनी सूंढ़ में फ़क़ीर को पकड़कर जोर से पटक दिया। फ़क़ीर की सभी हड्डियाँ टूट गई वो चिल्ला ने लगा।रोने लगा फिर बादशाह ने फकिर से पूछा की एक मौक़ा और दिया। जायेगा की जगत सत्य है ऐसा बोल दे। मुक्त हो सकते है। फ़क़ीर बोला की हूँ हे बादशाह तेरा ये राज मिथ्या है, मुझे पटक दिया वो भी मिथ्या है, मेरी हड्डियाँ टूट गई वो भी मिथ्या है और मेरे रोने की चीख आप का सुनाई पड़ती है वो भी मिथ्या है। मेरी मौत हो जायेगी ये आप का मानना भी मिथ्या है। वे सुनकर बादशाह ने फ़क़ीर को मृत्युदंड  दे दिया। ये कहानी फ़क़ीर और बादशाह के बीच सिमित नहीं है।हम सबकी है, अब भी ऐसे फ़क़ीर मौजूद है और मुर्ख बादशाह भी मौजूद है,ऐसी आवाज इशुर्न उठाई क्या मिला ? वध स्तंभ पर लटका दिया। सजाये मौत ऐसी आवाज सोक्रेटिस ने उठाई क्या मिला ? जहर दिया गया। मीरा को जहर दिया महमद को चैन से जीने नहीं दिया आज भी ऐसा संत फकीरों को साथ ऐसा सुलूक किया जाता है। क्योकि पागालोकी भीड़ बहुत है। मजेकी बात ये है की जिसने फ़क़ीर और संत को मृत्युदंड दिया। वो सब पागल मिलकर इशु की चर्च खड़ी करके पूजा प्रार्थना कर रहे है। पूरी जिंदगी कृष्ण को चैन से बैठ न दिया। आज उसके हजारो मंदिर खड़े कर दिये है। और सारे पागल मिलकर वहाँ शिर टेकते है सबने भगवान का स्वीकार कर लिया। संत फ़क़ीर की पूजा की जाय अगर अपमानित या मृत्युदंड दिया जाय, उससे कोई फर्क पड़नेवाला नहीं है। वो अपने सिध्धांत पर अडिग है। मेरा वक्तव्य पढ़कर आप को सही लेंगे या गलत वो भी मिथ्या है मैंने लिखा है वो भी मिथ्या है आप पढ़ रहे है वो भी मिथ्या है। आगे लिखा गया था ।वो भी मिथ्या है, बाद में लिखेंगे वो भी मिथ्या है। मिथ्या का अर्थ असत है। ऐसा नहीं है, क्योकि संत फ़क़ीर को सुनकर तुम सदगुरु तक पहुच पाते है। और ग्रंथ पंथ को सत्य भी नहीं कह सकते क्योकि सब के घर पे कुरान बाइबल गीता धर्मग्रंथ और दर्शन शाश्त्र है। लेकिन ग्रंथ पढने से आप को रहस्य पाना दुर्लभ है। स्वीकार और अस्वीकार करना दोनु भाव मिथ्या है। जब तक तुम्हे अपना स्वरूप का पता न लग जाय तक मिथ्या का सूत्र समजना कठिन है। जगत मिथ्या है। इस सूत्र के आधार पर तुम नि:संशय हो सकते है। संत फ़क़ीर को समजने के लिए तुम्हे संत पद को पाना होगा। सत का अभाव नहीं और मिथ्या का अस्तित्व नहीं है, सत तूम हो।
=>>अगर फ़क़ीर मौन हो जाय जगत मिथ्या है ऐसा न बोलने पर मृत्युदंड नहीं मिलता लेकिन जिसने रहस्य को पा लिया वो भला कैसे चुप रह सकता है। वो तो फ़क़ीर का स्वभाव बन गया।वो उसके बस की बात नहीं है। भीतरी आवाज को रोक न शका ऐसी कोई सत्ता अब तक खड़ी  हुई ही नहीं सत्य में बहुत ताकत होती है। फ़क़ीर की असली आवाज हजारो फ़क़ीर पैदा कर सकती है।

पल ही जीवन पल ही मौत :-

=>> प्रिय आत्मन ज्ञानी की एक पल अमृत है। और अज्ञानी एक पल मौत है। आत्मज्ञान ही अमृत है।और देह भाव ही मृत्यु है।अब मिली हुई पल तुम्हारा जीवन बन सकती है। इसी पल के आधार पर मृत्यु से पार हो सकते है।ज्ञानियों के लिए हर पल अमृत बरस रहा है। अगर आप इस एक पल चुक गए तो पल ही मौत बन सकती है। अगर तुम गहेराई में उतरोगे तो जब तक पल है तब है तब तक मृत्यु हो सकती है। इस पल के आधार पर तुम्हे कालातीत अपना स्वरूपको जानना है।सही जीवन,अभी इस वक्त मिल सकता है। तुम उसे कल पर मत छोड़ो कल तुम्हारा काल बन सकता है। तुम जहाँ बैठे हो।वहाँ इसी पल तुम्हे सही जीवन मिल सकता है।तुम भुत और भविष्य की गहराइया मई मत उलजो वर्तमान को साधो। वर्तमान तुम्हारे लिए खुला द्धार है। रसोई तैयार है आप भोजन के लिए बैठ गए,रोटी सब्जी सब थाली में पिरोसे है। अब भोजन करना है। अगर आप घरवालो को बोलेगे की कल कौन सी सब्जी बनाने वाले है ?अब मिली है उस सब्जी में रस पाना है। कल आप हो या न हो  कोई गेरंटी नहीं है ।हम कहते है चलो हमारी साथ भजन सतसंग में संतदर्शन का लाभ होगा। लोग कहते है आज नहीं बाद में कभी आयेगे। टालते है। रस नहीं है, जूठा बहाना बना लेते है। नई तरकीब खोज लेता है। अपनी जिंदगी से तुम खिलवाड़ मत करो।बादमें पस्ताओगे ज्ञानी कल पर नहीं छोड़ता। हर पल ज्ञानियों को अमृत की वर्षा हो रही है।जिंदगी के चमन में प्रेम के फुल खिलते है। जिंदगी उत्सव बन गई है। तुम आनंद से भर सकते है। अब अधेरा नहीं है, बाहिर भीतर रोशनी ही रोशनी है। न सुख है न दू:ख है ,तुम परम आनंद स्वरूप है।तुम देशकाल और बस्तु से पर हो गए। असीम और अनंत आदि और अंत रहित अपना स्वरूप का रहस्य तुम पा सकते हो। नि:संशय होकर तुम आनंद के महासागर में डूब सकते है।  तुम ज्ञानी संत की नहीं सुनी तो जिंदगी एक कारावास होकर रहेगी। संत महापुरुषों की करुणा से तुम्हे। सही जिंदगी मिल सकती है। ऐ आखरी पड़ाव है। उसे चुको मत दृढ संकल्प तुम्हारा पहला चरन है। अपने को पूरा दाव पर लगा के देखो बाजी पलट जायेगी। श्रध्धा और विस्वास के साथ तुम्हे सदगुरु के द्धार पे जाकर अपने को खुला छोड़ना है। तुम्हे तुम्हारी मंजिल मिल सकती है। आपकी मरजी।

दृढ संकल्प

=> प्रिय आत्मन ! बिना संकल्प आदमी सफल नहीं हो पाता। दृढ़ संकल्प से आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत होती है। संकल्प प्रथम चरण है। बलिराजा ने जब वामनरूप भगवान के आगे दृढ़ संकल्प किया,तब परम तत्व परमात्मा को पा लिया। जब तुम सदगुरु के चरण  जाते हो,तब जो तुम्हारा है,वह दाव पर लगाना है,दूसरा विकल्प नहीं है।श्रुति का सूत्र है तेन त्यत्केन भुंजीथा। 
=> जिसने  त्यागा उसीने भोगा। मतलब हरी रस को पा लिया…. एक ही मार्ग से सारे महात्मा लोग गुजरते है।उसीको दृढ़ संकल्प जानो। दृढ संकल्प बिना मंजिल कभी मिलती ही नहीं। आध्यात्मिक मार्ग में संकल्प पहला चरण है। दृढ़ संकल्प से यात्री साक्षिभाव में स्थित होता है। यह फलश्रुति जानो।
=> साक्षि ज्ञान की आँख है। सारे आरोप छुट जाते है। आप अपने को सबसे अलग देख सकते हो। शारीर,मन और प्राण का आप साक्षि है। तुम विचार को देख सकते हो,विचार मन से होते है। तुम मन से परे हो। तुम ज्ञाता हो। कर्ता नहीं हो। कर्ता ही भोक्ता होता है। साक्षिभाव से कर्तत्व भावकी भ्रान्ति विलीन हो जाती है। आरोपी को सजा मिलती है। साक्षि छुट जाता है। ऐसा विवेक सदगुरु से मिलता है। विवेक ज्ञान का साधन है बिना ज्ञान मुक्त होना असंभव है। विवेक से अपने स्वरूप प्रति जागृति होती है। आप मृत्यु से परे हो। अमृततत्व आप हो। आप आये नहीं तो जायेगे कहाँ ? आपका जन्म हुआ ही नहीं तो मृत्यु किसको आयेगी ? साक्षिभाव से गलत धारणा छुट जाती है।
=> पूर्णता को पाने के लिए साक्षिभाव से गुजरना होगा। समाधान,शांति याने आनंद सब पर्यायी शब्द है। उसे पूर्णता कहते है। साक्षि और साक्ष्य के बीच जो अंतर है, वह टूटने पर पूर्णता प्राप्त होती है।
=> जगत और ब्रह्म दो नहीं है। आत्मा और अनात्मा दो नहीं है। जड और चेतन दो नहीं है। जैसे स्वप्नद्रष्टा ही स्वप्न के पदार्थ रुपमे प्रतीत होता होता है। निमित उपादान कारन स्वप्नद्रष्टा है। उसका ही आविर्भाव है। जैसे बिज और वृक्ष में कोई अंतर नहीं है। सोना ही गहने के रूपमें प्रकट होता है। वास्तविक भेद नहीं है। कथन मात्र भेद है। जब द्दैत की धारणा छुट जाती है, तब अद्दैत सिद्ध होता है।
=> बंधन याने मुक्ति अज्ञान से खड़ी होती है। किसने आपको बंधा है ? किससे आपको छुटना है ? आपकी जालमे आप फंसे है। 
=> आप शुद्ध, नित्य, ब्रह्म, सत, चित, आनंद स्वरूप है। यह श्रुति का प्रमाण जानो। अपनी महिमा में पूर्णरूप से स्थित हो। ब्रह्म निर्वाण।

अद्दैत सिध्दांत

=> प्रिय आत्मन। जिस दिन द्दैत की धारणा छुट जाती है,तब अदैत सिध्ध होता है। कई लोग अदैत का अर्थ एक है ऐसा समजते है। अदैत सिध्धात समजनेवाले ज्ञानि महापुरुष पूर्णता को प्राप्त होते है। जीव और ब्रम्ह,आत्मा और अनात्मा।जिव,जगत और जगदीश की एकता करनेवाले सरे धर्माचार्य दैतवादी है। अदैत सिध्धात प्रकट होने पर ज्ञाता,ज्ञान और ज्ञेयभाव विलीन हो जाता है। व्यापक-व्यापकभाव दृश्य-द्रष्टाभाव अदैत सिध्धात में टिकता नहीं है।जिस वास्तु का प्रणाम दिया नहीं जाता,उसे अदैत कहते है,कई लोग  है मैंने आत्मा की अनुभूति की है। ऐसा कहनेवाले अपनी मुर्खता को प्रगट करते है। कौन किसकी अनुभूति करता है ? आप खोजने निकलोगे तो आप भटक जाओगे। जिस वस्तु को आपने कभी खोयी नहीं है,उसको तुम कैसे पाओगे ? पाने की चेष्टा मत करना।
=> दुनिया में बहुत से संप्रदाय और धर्माचार्य द्दैत में उलजे हुए है। दुःख का मूल कारन द्दैत है। कोई दूसरा हमें दुःख दे रहा  है। इस भ्रान्ति में अरबो लोग जीते है। संसार दुःखरूप है। ऐसा धर्माचार्य बार बार दोहराते है। जब आप खोजने निकालोगे तो आप संसार को कही नहीं पाओगे। संसार हैही नहीं ,तो उसका कार्य दुःख कैसे हो सकता है? और दुःख नहीं है,तो  औषध और वैध का क्या प्रयोजन? इस दुनिया में धर्माचार्य जैसे दुखी कोई दिखाई नहीं पड़ता। वे अपनी समस्या को दुसरो पर थोपते है। बिना सदगुरु अदैत सिध्धांत समाजमे नहीं आता और आनंद शांति जीवन में कभी घटित नहीं होते,हमारा यह वत्क्व्य पढ़कर मनमे सवाल उठेगा की आप किस को सूना रहे हो। द्दैत को तो आप खडा कर रहे हो। आप गौर से सुनोगे तो जवाब तुम्हारे भीतर ही पाओगे,यह वत्क्व्य देने से हमारा अद्दैत खंडित नहीं होता। जिस दिन खुद का पता चल जायेगा तब द्दैत टिक नहीं पायेगा। तब समाधान होगा।   

पूर्ण दर्शन

=> प्रिय आत्मन ! परम कृपालु श्री सदगुरु ब्रह्मनिष्ठ, ब्रह्मश्रोत्रिय, कपटरहित, सर्वहितेषी,दयावान,सबके साथ मैत्रीभाव रखनेवाला, जिसकी शुभ-अशुभ वासना क्षिण हो गई हो ऐसा महापुरुष तुम्हे जीवनमुक्त की शिक्षा दे सकते है।उन्हें मेरा कोटि कोटि प्रणाम।
=> अधिकारी शिष्य बुद्धिमान,संत और शास्त्र और अटूट श्रद्धावाला,विवेक और वैराग्य जिसका आभूषण हो, जिसका मन वाणी,इन्द्रिय अपने बस में हो और ब्रह्मज्ञान की तीव्र इच्छावाला मुमुक्षु मिलना दुर्लभ है। 
=> इस दुनिया में बुद्धिशाली बहुत है, लेकिन बुद्धिमान ढूढ़ना मुश्किल है। बुद्धिमान उसे कहते है जो खुद का कल्याण कैसे हो वह सोचता है।
=> वे ज्ञानि संत सदगुरु के पास जाकर नित्य-अनित्य का विवेक पाते है। इससे भीतर वैराग्य प्रकट होने से बाहरी दौड़ खत्म हो जाती है। भीतर यात्रा के लिए सदगुरु का शरण पा लेता है। सतसंग उसके लिए श्रेष्ठ साधन है।
=> सदगुरु शुरू में साधक को अंत:करण की शुद्धि के लिए अनुशासन देता है। शाश्त्र में दश दोष का निवारण करने का आदेश दिया गया है। तन के तीन दोष माने गए है-चोरी, जारी और हिंसा। बानी के चार दोष है। जूठ बोलना,निंदा करना,कठोर बानी, वाकचातुर्य और मन के तिन दोष है-चिंता,तृष्णा,बुद्धि की मन्दता। 
=> संत-प्रणाली में पाँच प्रतिज्ञा साधक को दी जाती है। शराब,माँस,चोरी,जारी और जुआ का निषेध किया गया है। यह सुक्ष्म विज्ञान है। बिल्डिंग बनाना हो तो बिल्डिंग का बेज मजबूत होना चाहिए वरना भूकंप में टिक नहीं सकता।
=> आध्यात्मिक मार्ग में दू:खी ऋग्ण चित्वाला कायर आदमी यात्रा नहीं कर पाता।
सत्य पाने के लिए चाहे मृत्यु क्यों न हो ? ऐसी लगन होनी चाहिए। अपना शीश काटकर सदगुरु के शरण में रखने की हिमत चाहिए। ऐसा शूरवीर पुरुष परमात्मा को पा सकता है। इसमें कोई शक नहीं है।
=> शिष्य जब अपना शीश गुरुचरण में अर्पित करता है, तब उसका अहंकार मिट जाता है। में देखता हूँ,  सुनता हूँ, बोलता हूँ, स्पर्श करता हूँ, सूंघता हूँ, ये सारी धारणाये छुट जाती है।
सदगुरु तुम्हे तिन चीज प्रदान करते है। पहला शब्द छोड़कर लक्ष लेने से ज्ञान होता है। दूसरा,सदगुरु तुम्हे द्दृष्टि देता है और सदगुरु के मुंह से सूना हुआ शब्द श्रुति कहलाता है। अब तुम्हारे लिए बोलने के लिए गुरुमुख है। अब तुम्हे गुरुद्दृष्टी से देखना है।तुम्हारी द्दृष्टि काम आनेवाली नहीं है। 
तुम सूर्य को बड़ा देखते हो और पृथ्वी को छोटी देखते हो। यह सही नहीं है। यह तुम्हारा अज्ञान है। सही देखने के लिए गुरु की आँख चाहिए। 
=> मै बड़ा हूँ,तुम छोटे हो, इस गलत धारणा से संसार में जगडे होते है। व्यावहारिक सता मे भी ज्ञान जरुरी है। सब अपनी अपनी जगह पर सही है। कोई छोटा-बड़ा नहीं है।ऐसा ज्ञान होने से तुम्हारा अहंकार छुट जाता है। गुरुद्दृष्टि ही इलाज है। 
=> जड़ और चेतन जैसी द्दैत धारणा में अरबो लोग जीते है। सदगुरु की दृष्टी में दो नहीं है। जड़ का अर्थ होता है अज्ञान और चेतन का अर्थ होता है ज्ञान। ऐसा शाश्त्र में लिखा कहा गया है।
आज विज्ञान युग में संशोधित किया है की यह एक ऊर्जा का आविर्भाव है। उसे एनर्जी कहते है। एनर्जी अनेक रूप में प्रतीत होती है। उसे वेद-प्रणाली में अस्तित्व कहते है और संत-प्रणाली में चेतन कहते है। उसके पर्यायवाची शब्द बहुत है। जैसे इश्वर ब्रह्म कूटस्थ,आत्मा ,सत्य,सब कथनभेद है। फिर भी अद्दैत है
=> सदगुरु की युक्ति के माध्यम से आप समज पाते है की अस्तित्व किसीके आश्रित नहीं है।वह स्वयं है। वह खुद पूर्ण रूप से अपनी महिमा में प्रकट है। ऐसा ज्ञान सदगुरु-युक्ति के माध्यम से होने पर तुम्हारी द्दैत की धरना टूटने से अहंकार चूर चूर हो जाता है।
=> कही लोग एस़ा कहते है की हम दीवार को जानते है। दीवार हमें नहीं जानती। हम शरीर को जानते है,शरीर हमें नहीं जानता। यह अज्ञान की भाषा है।
=> ज्ञानी ऐसा नहीं कहते,क्योकि उनकी दृष्टी में अस्तित्व के सिवा दूसरा है ही नहीं। तुम अस्तित्व का हिस्सा हो। कही लोग जड़ को सोया हुआ चेतन कहते है। यह बात गलत है, चेतन कभी सोता नहीं। इसलिए तो उसे चेतन कहते है। अस्तित्व के  में तार्किक और बुद्धि के बल पर चलनेवाले भटक जाते है।उनके पास समाधान नहीं है।उनके भरोशे मत रहेना। मंजिल कभी भी नहीं मिलेगी। तूम अज्ञानी हो ऐसा सोचना ही अज्ञान है। तुम ज्ञान-स्वरूप हो सत्संग में सदगुरु कहते है की तूम कौन हो,कहा हो और कैसे हो।शिष्य की समज में नहीं आता।बिद्धि कुंठित हो जाती है। सदगुरु के पास भी जवाब नहीं है। फिर भी उसका समाधान करने का सामर्थ्य सदगुरु में अवश्य है। सदगुरू  कहते है की तुम ज्ञान पाने के लिए तुम्हारा जो है उसे गुरु चरण में समर्पित कर दो। यह अजोड युक्ति है।शिष्य जब दृढ़ संकल्प कर लेता है,तब उसके पास कोई शब्द नही है। नि:शब्द स्थिति हो गई। फिर भी भीतरी दिया प्रकट हो गया। मै कौन हूँ।कहा हूँ, कैसा हूँ,सारे प्रश्न मिट गए, शिष्य के साथ भी गुरु चल बसा, मर गया,मारना ही सदगुरु का पेशा है। स्मशान मै जिंदा आदमी जलता है। मुर्दे को पता नहीं की मै मरा हूँ या जीता हूँ। सारे सवाल ज़िंदा आदमी को होते है। मुरदे ऐसा नहीं कहते की मै अमर हूँ। अकर्ता-अभोकता हूँ। अब कुछ होनेवाला नहीं है। कैसे हो सकता है? इस जानकारी के लिए तुम्हे मरना होगा। उपदेश देने के लिए सदगुरु को मरकर ज़िंदा होना पड़ता है। अब भीतरी बदलाव आ गया। बीज दिखाई पडेगा फिर भी भीतर अंकुर जल गया है। अब पेड़ होने की संभावना नहीं है। उसे जीवन्मुक्त कहते है। अब कोई उम्मीद नहीं है।
=> तुम अपने में परिपूर्ण हो। आपने कही शास्त्र में पढ़ा होगा या सूना होगा की इश्वर है। किसे ईश्वर कहते है? कैसा है और कहाँ है। पहला प्रश्न इश्वर किसे कहते है? ईश्वर देश, काल, वास्तु से परे है। मेरा कहने का मतलब यह नहीं है की ईश्वर और जगत इश्वर और तुम दो हो। सारा विश्व इश्वर में ही समा जाता है। जैसे बूंद सागर में समाती है। तुम तुम नहीं हो,तुम और इश्वर में कोई भेद नहीं है, स्वयं ज्ञान-स्वरूप अस्तित्व तुम हो। जगत जगत नहीं है। इश्वर है। माया माया नहीं है, ईश्वर है। जिव जिव नहीं है इश्वर के सिवा कुछ है ही नहीं। कथनभेद वस्तुभेद नहीं है।अब सवाल है की ईश्वर कहाँ है? ईश्वर ही है इश्वर के सिवा कुछ है ही नहीं। कहा है ऐसा कहना ठीक नहीं है। जैसे शक्करमे मीठापन पूर्ण रूप से है, ऐसे परमात्मा व्यापक है। ईश्वर ही अस्तित्व है और अस्तित्व तुम हो। तुम बोलते हो फिर भी सदा मौन हो। तुम देखते हो फिर भी नहीं देखते। चलते हो फिर भी नहीं चलते। इस गूढ़ रहस्य को जिसने पा लिया वह नि:संशय हो गया। उसे पूर्ण दर्शन कहते है। वह तुम हो।

સ્વરૂપજ્ઞાન

=> સત્ય,જેમાં ત્રણ કાળ નથી.કાલાતીત હોવાથી નાશ સંભવતો નથી.તે પરમ સત્યરૂપ ઈશ્વર વેદની અંદર વર્ણવ્યો છે.
=> સ્થૂલ,સુક્ષ્મ અને કારણએ ત્રણ દેહથી હું અલગ છે. હું શરીર નથી,ત્રણ અવસ્થાયી હું ન્યારું છે.ત્રણ અવસ્થા -હું નથી.અવસ્થા બદલાય છે. હું અપરિવર્તનશીલ છે.
=> શરીર છ વિકારવાળું છે. હું અવિકારી છે,માટે 'હું' નો નાશ સંભવતો નથી.હું પરમ સત્ય છે, તે જ ઈશ્વર છે,તે તું છો.તે વેદાંત મત જાણવો.
=> સંતપ્રણાલીમાં 'હું' ને નામી કહે છે અને નામની લક્ષણા ઈશ્વર આપવામાં આવી છે.નામી અને નામ અભેદ છે.તેમ હું ને ઈશ્વર અભેદ છે.ઉપનિષદમાં નામને અમૃત કહ્યું છે. બધું બાદ કરતા નામ વધે છે. તે કહેતા ઈશ્વર તું છો. 
=> અદ્વૈત મત વેદનું અંતિમ લક્ષ જાણવું. દ્વૈતભાવ દુઃખનું કારણ છે. સુખ અને દુઃખ , રોગ અને દ્વેષ ,હરખ અને શોક,તમામ દ્વંદ્વથી પર તમારું સ્વરૂપ જાણવું. હું નિર્લેપ ન્યારું ને અસંગ છે. તેને જ્ઞાન જાણવું. હું પોતાના માં જેમનું તેમ છે.
=> હું અનંતરૂપે પ્રકાશીને રહેલું છે. વ્યાપક અને પરિપૂર્ણ હોવાથી તમામ સંશય વિરમી જાય છે. હું જ અસ્તિત્વ છે. હું સિવાય અણુ માત્ર જગ્યા ખાલી નથી. હું જ ચૈતન્ય છે. ચૈતન્ય તે જ ઈશ્વર છે. હું મન,વાણી  અને બુદ્ધિનો વિષય નથી. સદગુરુ યુક્તિરૂપી સાધન દ્વારા અપરોક્ષ અનુભૂતિ કરાવે છે.  હું જ અનંતરૂપે પ્રકાશીને રહેલું છે.
=> હું સર્વને આવરીને રહેલું છે. પીંડ અને અનંત બ્રહ્માંડરૂપે વિસ્તાર પામેલું છે. હું જ્ઞાન સ્વરૂપ હોઈ પરમ સત્ય, ઈશ્વર તું છો,તે શ્રુતીનો આખરી નીચોડ જણાવો.સદગુરુના કૃપાપ્રસાદથી જીવનની પૂર્ણતાને પામી શકાય છે.   

मैं ही मैं हूँ

=> ना मैं पुरुष हूँ।ना मैं स्त्री हूँ।ना मैं हिंदू हूँ।ना मैं मुसलमान हूँ।ना मैं इसाई हूँ,ना मैं किसी का बेटा हूँ। ना कोई मेरा बाप है , ना मेरा कोई रिस्तेदार है। ना मेरा कोई धर्म है। ना मेरा कोई पंथ है।ना मेरा कोई संप्रदाय है। ना मैं शरीर।ना मेरा शरीर है। ना मैं आया हूँ,ना मैं जाऊँगा।ना मेरा लोक है , ना मेरा परलोक है।  ना मैं मानव हूँ, ना मैं दानव हूँ। ना मैं कोई देव हूँ , ना मेरी उत्पति है। ना मेरी स्थिति है। ना मेरा लय है। ना मेरा कोई गुरु है। ना मैं किसी का चेला हूँ। ना जिया हूँ, ना मैं मरूँगा। ना मैं द्रष्टा हूँ,ना मैं साक्षी हूँ। ना मैं धता हूँ,ना मैं ज्ञाता हूँ। ना मैं स्त्रष्टा हूँ। ना मैं अल्पज्ञ हूँ। ना मैं सर्वज्ञ हूँ। ना मैं शब्द हूँ,ना मैं बानी हूँ, ना मैं ओमकार हूँ,ना मैं प्रेरक हूँ। ना मैं ज्योति हूँ,ना मैं ध्यानी हूँ। ना मैं त्यागी हूँ,ना मैं भोगी हूँ। ना मैं वैरागी हूँ।ना मैं संन्यासी हूँ। ना मैं हंस हूँ,ना मैं परमहंस हूँ। ना मैं पुरुषोतम हूँ। ना मैं ज्ञानी हूँ,न मैं विज्ञानी हूँ, ना मैं भौतिक हूँ,इन विशेषणों से मैं पर हूँ।


मुझे मत पूछो,मैं क्या हूँ ?
उतर : हमारा एक है बस मैं ही मैं हूँ।
अनुभव हमार होता नहीं है।
उतर : हमारा एक है। बस मै ही मैं हूँ।
क्या ढूँढूँ मैं आपको,कहीं ना मिलूँगा मैं। 
मिलना बिछडना सब फोक है। बस मैं ही मैं हूँ।
सवाल वो करता है,जो खुद को ना पाया।
उतर : उसे कहते सवाल, बच ना पाया।
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: 

ज़िन्दगी : एक सफ़र

 ( ग्रन्थकर्ता का परिचय ) 

=>  सदगुरु कृपा ही केवलं। मेरा वतन है उ. गुजरातके महेसाणा जिले का एक छोटा सा गोंव उबखल  वही मेरी जन्मभूमी और कर्मभूमि रहा है। उबखल मे  एक अल्प साधन गरीब प्रजापति परिवार में मेरा जन्म हुआ।पिता  का नाम जेठी राम और माता का नाम था हेमकोरबा। पिता भक्ति संस्कार से संपन्न ,भोले साफ हदय और सरल स्वभाववाले थे। माता भी शांत स्वभाववाली,संतुष्ट,विचारशील और भावना की मूरत थि। सहनशीलता उसका विशिष्ट  गुण था।

=>  पिताश्री और मातृश्री निरांत पंथ में दिक्षित हुए थे। उनके गुरु थे रिद्रोल (ता. माणसा ) निवाशी प.पु श्री मणीरामजी महाराज। मेरे पिताश्री का देहावसान दि. २५ -१-२००६ के रोज हुआ था और मातृश्री का देहविलय ३० -१०-२०१० के दिन हुआ। हमारा परिवार बड़ा है सभी भाइयो में सबसे बड़ा हु। मेरी पढाई उबखल से निकटतम बड़े गॉव कुकरवाडा में हुइ। वर्हा आठवी कक्षा तक पढाई हुइ। तभी शाला के आचार्य ने मै बेकसूर होते हुए भी मेरी पिटाई की। इस अपमान को सह नहीं सका और वही से मैंने पढाई छोड़ दी और पिताश्री के पारिवारिक धंधे के वही काम  में हाथ बटाने लगा।

=> उबखल से निकट ही एक गॉव है पिलवाई। वर्हा के एक प्रजापति परिवार की बेटी पार्वती के साथ, छोटी उम्र में ही मेरी शादी हुई।हमारा गृहस्थ जीवन भक्ति भाव से भरा हुआ था। दाम्पत्य-यात्रा में तीन बेटे और एक बेटी हमें प्राप्त हुए। बेटो के नाम है नरेश , राजू और रोहित. बेटी का नाम रमिला। आनन्द से हमारा जीवन बीत रहा था की सौभाग्य से एक दिन उसमे नया मोड़ आया।

=> एक दिन हमारे गॉव में पु.श्री मणीरामजी महाराज पधारे।उनके भजन सत्संग का लाभ लेने के लिए मै भी गया। सत्संग के दौरान महाराज श्री ने कहा." परब्रह्म परमात्मा व्यापक है, सचराचर उससे परिपूर्ण है। उसे पाने के लिए 'में कौन हु?' 'कहा से आया हु?' 'मेरा स्वरूप क्या है?'- इन प्रश्नों का ज्ञान पाना आवश्यक है' यह सुनते मै सोच मै पड़ गया मेरी उम्र तब २१ की थि. गीता,भागवत आदि का पठन मैं ने किया था लेकिन ये सारी बाते मेरी समज से बहार थी

=>  मैंने महाराजश्री से कहा की मैंने कही पढ़ा है की परमात्मा मन,बुध्धि और वाणी से परे है-फिर उनके अपरोक्ष स्वरूप को आप हमे किस प्रकार समजा सकते है? महाराजश्री ब्रम्हनिष्ठ थे।बहुश्रुत भी थे। वे बोले ,'हम आपको अगम-अगोचर-परब्रह्म परमात्मा का अपरोक्ष रूप से ज्ञान दे सकते है,लेकिन तुम्हे हमारे वचन का पालन करना होगा।'

=> मैंने कहा, 'आत्मज्ञान पाने के लिए मुझे आपकी हर शर्त मंजूर है।' तब महाराजश्री हमें बोध करने पर राजी हो गयेवह दिन था ३० जनवरी, १९७२। निरांत पंथ की परम्परानुसार हमने बोध लिया सुबह उठते ही मुझ पर ज्ञान का नशा छा गया मुझे नया जीवन मिल गया उस अवर्णनीय घटना का वर्णन करने के लिए हमारे पास शब्द नहीं हैअब मन मै कोई प्रश्न नहीं बच पाया थाबस,समाधान था,समर्पण थासदगुरु ही अब मेरे लिए सब कुछ थे लेकिन यह खुमार टिक सका नहि

=>  समय की धारा  में हम बहते गये गृहस्थ जीवन की गुत्थियो में उलझते गये बच्चे बड़े होने लगे थे उनका पालन-पोषण, पढाई-लिखाई,घर-गृहस्थी आदि के खर्च को जुटाने में हमारा सारा समय व्यतीत होने लगा भजन-सत्संग में जाना मुस्किल हो गया.सामाजिक व्यवहारों की वास्तविकता हम पर हावी होती चली गईफिर भीतर ज्ञान की चिंगारी जलती रही. जीवन की वास्तविकता इतनी कठोर थी की कभी कभी दौ जून भोजन जुटाना भी मुस्किल हो गया। पैसे जुटाने की तो कल्पना करना भी मुस्किल थाफिर भी श्रधा-विश्वास के बल पर हमारी ज्ञान-निष्ठां अडिग रही

=>  ऐसे विकट समय में भी हमने अपना गृहस्थ-धर्म अच्छी तरह निभाया बादमे एक दिन सद्गुरु महाराज का बुलावा आया और हम उनकी आध्यात्मिक यात्रा-भजन-सत्संग आदि में प्रवृत हो गए जब में गुरूजी से मिलता तब मूक हो जाता थाबोल नहीं पता था सत्संग के दौरान अंतमुख हो जाता था यह देखकर महाराजश्री ने कहा, -'तुम पूर्ण हो गये।'तब से मैंने अपना नाम "पूरण" रख दिया उसे गुरु-प्रसाद समजकर स्वीकार कर लिया वो तो सद्गुरु के नाम में ही सारे नाम समा जाते है

=> आखिर संतो भक्तो की साक्षी में सद्गुरु महाराज ने हमें आचार्य -पद का अधिकार दिया तब से मुमुक्षुओं तक सदगुरु का पयगाम पहुचने के लिए गुरु-ज्ञा से बोध देने का धर्म निभाना शुरू किया में तो संतो का दास हूँ  और रहूँगा फिर भी मेरे जीवन के दो उद्देश्य है-सेवा और सत्संग अब अंतिम साँस तक गुरुगुण गाना ही जीवन का लक्ष्य हो गया है

 गूंगे को बानी दिये,बधिर को दिए कान 
अंधे की गुरु आँख है ,पूरण गुरु की सान

'पूरण' महाराज 
मु: उबखल , ता: विजापुर 
जि: महेसाणा 
मो : 99988 90688

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हमें देखो हमार मत देखो 
तुम्हे तुम्हारा छूट जायेगा 
अगर हमारे पास आये तो  
तुम लूटके रह जाओगे ।।

 डरता है वोही मरेगा 
वोतो कुछ नहीं पायेगा ।।
खाली हाथ आया और  
खाली हाथ जाएगा ।।
थामले हाथ हमारा तुम्हे 
तुम्हारे असली घर पहुचाएंगे ।।
आने जानेकी जंजटसे हम तुम्हे 

सदाके लिए छुड़ायेंगे ।।
न वहा कोई अपना और पराया है 
जगडे सारे मिट गये अपना आप दिखाया है ।।
निजानंद नशेमे चकचुर हो कर तुम 
होश ,हवास तुम्हारा खो जायेगा ।।

मंजिल तुम्हारे कदमोमे आकर वो 
सदा के लिए रुक जाएगी ।।
मोह के नशेमे पाव तेरे लड़खड़ाते है 

पूरण अपने कंधो पर बिठाणे को तैयार है ।।
आप अनाडी अपन आपसे यार 
कब तक नींद में सोयेगा ।।
खाली होकर बैठेंगे तो 
आनंद से भर जायेगा ।।

श्रध्धा रखना शक मत करना 
बंदा वादा हम निभाएंगे ।।
ऐतबार है हमें हमारे पर 
हम तुम्हे मिटाकर ही रहेंगे ।।
पक्का है वादा सच्ची है बात 
कहे सो कश्के दिखाएगे ।।
काटेंगे शर पहुचाएंगे घर तुम्हे 
अधर आशन जमायेंगे ।।
न तुम रहे न हम रहे सारा जहाँ मिटायेंगे 

शेषमें शेष इशमें आप अनंत हो जायेंगे ।।
आपकी अक्कड़ छुतेगी पक्कड़ हम 
लकीर का फ़क़ीर मिटाएगे ।।
फ़क़ीर का फ़क़ीर में हु पूरण तुम्हे 
यार चौदिश गूंज सुनायेंगे ।।


जय श्री पूरण महाराज 

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