=> दुनिया में बहुत से संप्रदाय और धर्माचार्य द्दैत में उलजे हुए है। दुःख का मूल कारन द्दैत है। कोई दूसरा हमें दुःख दे रहा है। इस भ्रान्ति में अरबो लोग जीते है। संसार दुःखरूप है। ऐसा धर्माचार्य बार बार दोहराते है। जब आप खोजने निकालोगे तो आप संसार को कही नहीं पाओगे। संसार हैही नहीं ,तो उसका कार्य दुःख कैसे हो सकता है? और दुःख नहीं है,तो औषध और वैध का क्या प्रयोजन? इस दुनिया में धर्माचार्य जैसे दुखी कोई दिखाई नहीं पड़ता। वे अपनी समस्या को दुसरो पर थोपते है। बिना सदगुरु अदैत सिध्धांत समाजमे नहीं आता और आनंद शांति जीवन में कभी घटित नहीं होते,हमारा यह वत्क्व्य पढ़कर मनमे सवाल उठेगा की आप किस को सूना रहे हो। द्दैत को तो आप खडा कर रहे हो। आप गौर से सुनोगे तो जवाब तुम्हारे भीतर ही पाओगे,यह वत्क्व्य देने से हमारा अद्दैत खंडित नहीं होता। जिस दिन खुद का पता चल जायेगा तब द्दैत टिक नहीं पायेगा। तब समाधान होगा।
अद्दैत सिध्दांत
=> दुनिया में बहुत से संप्रदाय और धर्माचार्य द्दैत में उलजे हुए है। दुःख का मूल कारन द्दैत है। कोई दूसरा हमें दुःख दे रहा है। इस भ्रान्ति में अरबो लोग जीते है। संसार दुःखरूप है। ऐसा धर्माचार्य बार बार दोहराते है। जब आप खोजने निकालोगे तो आप संसार को कही नहीं पाओगे। संसार हैही नहीं ,तो उसका कार्य दुःख कैसे हो सकता है? और दुःख नहीं है,तो औषध और वैध का क्या प्रयोजन? इस दुनिया में धर्माचार्य जैसे दुखी कोई दिखाई नहीं पड़ता। वे अपनी समस्या को दुसरो पर थोपते है। बिना सदगुरु अदैत सिध्धांत समाजमे नहीं आता और आनंद शांति जीवन में कभी घटित नहीं होते,हमारा यह वत्क्व्य पढ़कर मनमे सवाल उठेगा की आप किस को सूना रहे हो। द्दैत को तो आप खडा कर रहे हो। आप गौर से सुनोगे तो जवाब तुम्हारे भीतर ही पाओगे,यह वत्क्व्य देने से हमारा अद्दैत खंडित नहीं होता। जिस दिन खुद का पता चल जायेगा तब द्दैत टिक नहीं पायेगा। तब समाधान होगा।