=> साक्षि ज्ञान की आँख है। सारे आरोप छुट जाते है। आप अपने को सबसे अलग देख सकते हो। शारीर,मन और प्राण का आप साक्षि है। तुम विचार को देख सकते हो,विचार मन से होते है। तुम मन से परे हो। तुम ज्ञाता हो। कर्ता नहीं हो। कर्ता ही भोक्ता होता है। साक्षिभाव से कर्तत्व भावकी भ्रान्ति विलीन हो जाती है। आरोपी को सजा मिलती है। साक्षि छुट जाता है। ऐसा विवेक सदगुरु से मिलता है। विवेक ज्ञान का साधन है बिना ज्ञान मुक्त होना असंभव है। विवेक से अपने स्वरूप प्रति जागृति होती है। आप मृत्यु से परे हो। अमृततत्व आप हो। आप आये नहीं तो जायेगे कहाँ ? आपका जन्म हुआ ही नहीं तो मृत्यु किसको आयेगी ? साक्षिभाव से गलत धारणा छुट जाती है।
=> पूर्णता को पाने के लिए साक्षिभाव से गुजरना होगा। समाधान,शांति याने आनंद सब पर्यायी शब्द है। उसे पूर्णता कहते है। साक्षि और साक्ष्य के बीच जो अंतर है, वह टूटने पर पूर्णता प्राप्त होती है।
=> जगत और ब्रह्म दो नहीं है। आत्मा और अनात्मा दो नहीं है। जड और चेतन दो नहीं है। जैसे स्वप्नद्रष्टा ही स्वप्न के पदार्थ रुपमे प्रतीत होता होता है। निमित उपादान कारन स्वप्नद्रष्टा है। उसका ही आविर्भाव है। जैसे बिज और वृक्ष में कोई अंतर नहीं है। सोना ही गहने के रूपमें प्रकट होता है। वास्तविक भेद नहीं है। कथन मात्र भेद है। जब द्दैत की धारणा छुट जाती है, तब अद्दैत सिद्ध होता है।
=> बंधन याने मुक्ति अज्ञान से खड़ी होती है। किसने आपको बंधा है ? किससे आपको छुटना है ? आपकी जालमे आप फंसे है।
=> आप शुद्ध, नित्य, ब्रह्म, सत, चित, आनंद स्वरूप है। यह श्रुति का प्रमाण जानो। अपनी महिमा में पूर्णरूप से स्थित हो। ब्रह्म निर्वाण।