=>> प्रिय आत्मन ज्ञानी की एक पल अमृत है। और अज्ञानी एक पल मौत है। आत्मज्ञान ही अमृत है।और देह भाव ही मृत्यु है।अब मिली हुई पल तुम्हारा जीवन बन सकती है। इसी पल के आधार पर मृत्यु से पार हो सकते है।ज्ञानियों के लिए हर पल अमृत बरस रहा है। अगर आप इस एक पल चुक गए तो पल ही मौत बन सकती है। अगर तुम गहेराई में उतरोगे तो जब तक पल है तब है तब तक मृत्यु हो सकती है। इस पल के आधार पर तुम्हे कालातीत अपना स्वरूपको जानना है।सही जीवन,अभी इस वक्त मिल सकता है। तुम उसे कल पर मत छोड़ो कल तुम्हारा काल बन सकता है। तुम जहाँ बैठे हो।वहाँ इसी पल तुम्हे सही जीवन मिल सकता है।तुम भुत और भविष्य की गहराइया मई मत उलजो वर्तमान को साधो। वर्तमान तुम्हारे लिए खुला द्धार है। रसोई तैयार है आप भोजन के लिए बैठ गए,रोटी सब्जी सब थाली में पिरोसे है। अब भोजन करना है। अगर आप घरवालो को बोलेगे की कल कौन सी सब्जी बनाने वाले है ?अब मिली है उस सब्जी में रस पाना है। कल आप हो या न हो कोई गेरंटी नहीं है ।हम कहते है चलो हमारी साथ भजन सतसंग में संतदर्शन का लाभ होगा। लोग कहते है आज नहीं बाद में कभी आयेगे। टालते है। रस नहीं है, जूठा बहाना बना लेते है। नई तरकीब खोज लेता है। अपनी जिंदगी से तुम खिलवाड़ मत करो।बादमें पस्ताओगे ज्ञानी कल पर नहीं छोड़ता। हर पल ज्ञानियों को अमृत की वर्षा हो रही है।जिंदगी के चमन में प्रेम के फुल खिलते है। जिंदगी उत्सव बन गई है। तुम आनंद से भर सकते है। अब अधेरा नहीं है, बाहिर भीतर रोशनी ही रोशनी है। न सुख है न दू:ख है ,तुम परम आनंद स्वरूप है।तुम देशकाल और बस्तु से पर हो गए। असीम और अनंत आदि और अंत रहित अपना स्वरूप का रहस्य तुम पा सकते हो। नि:संशय होकर तुम आनंद के महासागर में डूब सकते है। तुम ज्ञानी संत की नहीं सुनी तो जिंदगी एक कारावास होकर रहेगी। संत महापुरुषों की करुणा से तुम्हे। सही जिंदगी मिल सकती है। ऐ आखरी पड़ाव है। उसे चुको मत दृढ संकल्प तुम्हारा पहला चरन है। अपने को पूरा दाव पर लगा के देखो बाजी पलट जायेगी। श्रध्धा और विस्वास के साथ तुम्हे सदगुरु के द्धार पे जाकर अपने को खुला छोड़ना है। तुम्हे तुम्हारी मंजिल मिल सकती है। आपकी मरजी।