=> अधिकारी शिष्य बुद्धिमान,संत और शास्त्र और अटूट श्रद्धावाला,विवेक और वैराग्य जिसका आभूषण हो, जिसका मन वाणी,इन्द्रिय अपने बस में हो और ब्रह्मज्ञान की तीव्र इच्छावाला मुमुक्षु मिलना दुर्लभ है।
=> इस दुनिया में बुद्धिशाली बहुत है, लेकिन बुद्धिमान ढूढ़ना मुश्किल है। बुद्धिमान उसे कहते है जो खुद का कल्याण कैसे हो वह सोचता है।
=> वे ज्ञानि संत सदगुरु के पास जाकर नित्य-अनित्य का विवेक पाते है। इससे भीतर वैराग्य प्रकट होने से बाहरी दौड़ खत्म हो जाती है। भीतर यात्रा के लिए सदगुरु का शरण पा लेता है। सतसंग उसके लिए श्रेष्ठ साधन है।
=> सदगुरु शुरू में साधक को अंत:करण की शुद्धि के लिए अनुशासन देता है। शाश्त्र में दश दोष का निवारण करने का आदेश दिया गया है। तन के तीन दोष माने गए है-चोरी, जारी और हिंसा। बानी के चार दोष है। जूठ बोलना,निंदा करना,कठोर बानी, वाकचातुर्य और मन के तिन दोष है-चिंता,तृष्णा,बुद्धि की मन्दता।
=> संत-प्रणाली में पाँच प्रतिज्ञा साधक को दी जाती है। शराब,माँस,चोरी,जारी और जुआ का निषेध किया गया है। यह सुक्ष्म विज्ञान है। बिल्डिंग बनाना हो तो बिल्डिंग का बेज मजबूत होना चाहिए वरना भूकंप में टिक नहीं सकता।
=> आध्यात्मिक मार्ग में दू:खी ऋग्ण चित्वाला कायर आदमी यात्रा नहीं कर पाता।
सत्य पाने के लिए चाहे मृत्यु क्यों न हो ? ऐसी लगन होनी चाहिए। अपना शीश काटकर सदगुरु के शरण में रखने की हिमत चाहिए। ऐसा शूरवीर पुरुष परमात्मा को पा सकता है। इसमें कोई शक नहीं है।
सत्य पाने के लिए चाहे मृत्यु क्यों न हो ? ऐसी लगन होनी चाहिए। अपना शीश काटकर सदगुरु के शरण में रखने की हिमत चाहिए। ऐसा शूरवीर पुरुष परमात्मा को पा सकता है। इसमें कोई शक नहीं है।
=> शिष्य जब अपना शीश गुरुचरण में अर्पित करता है, तब उसका अहंकार मिट जाता है। में देखता हूँ, सुनता हूँ, बोलता हूँ, स्पर्श करता हूँ, सूंघता हूँ, ये सारी धारणाये छुट जाती है।
सदगुरु तुम्हे तिन चीज प्रदान करते है। पहला शब्द छोड़कर लक्ष लेने से ज्ञान होता है। दूसरा,सदगुरु तुम्हे द्दृष्टि देता है और सदगुरु के मुंह से सूना हुआ शब्द श्रुति कहलाता है। अब तुम्हारे लिए बोलने के लिए गुरुमुख है। अब तुम्हे गुरुद्दृष्टी से देखना है।तुम्हारी द्दृष्टि काम आनेवाली नहीं है।
तुम सूर्य को बड़ा देखते हो और पृथ्वी को छोटी देखते हो। यह सही नहीं है। यह तुम्हारा अज्ञान है। सही देखने के लिए गुरु की आँख चाहिए।
=> मै बड़ा हूँ,तुम छोटे हो, इस गलत धारणा से संसार में जगडे होते है। व्यावहारिक सता मे भी ज्ञान जरुरी है। सब अपनी अपनी जगह पर सही है। कोई छोटा-बड़ा नहीं है।ऐसा ज्ञान होने से तुम्हारा अहंकार छुट जाता है। गुरुद्दृष्टि ही इलाज है।
=> जड़ और चेतन जैसी द्दैत धारणा में अरबो लोग जीते है। सदगुरु की दृष्टी में दो नहीं है। जड़ का अर्थ होता है अज्ञान और चेतन का अर्थ होता है ज्ञान। ऐसा शाश्त्र में लिखा कहा गया है।
आज विज्ञान युग में संशोधित किया है की यह एक ऊर्जा का आविर्भाव है। उसे एनर्जी कहते है। एनर्जी अनेक रूप में प्रतीत होती है। उसे वेद-प्रणाली में अस्तित्व कहते है और संत-प्रणाली में चेतन कहते है। उसके पर्यायवाची शब्द बहुत है। जैसे इश्वर ब्रह्म कूटस्थ,आत्मा ,सत्य,सब कथनभेद है। फिर भी अद्दैत है।
=> सदगुरु की युक्ति के माध्यम से आप समज पाते है की अस्तित्व किसीके आश्रित नहीं है।वह स्वयं है। वह खुद पूर्ण रूप से अपनी महिमा में प्रकट है। ऐसा ज्ञान सदगुरु-युक्ति के माध्यम से होने पर तुम्हारी द्दैत की धरना टूटने से अहंकार चूर चूर हो जाता है।
=> सदगुरु की युक्ति के माध्यम से आप समज पाते है की अस्तित्व किसीके आश्रित नहीं है।वह स्वयं है। वह खुद पूर्ण रूप से अपनी महिमा में प्रकट है। ऐसा ज्ञान सदगुरु-युक्ति के माध्यम से होने पर तुम्हारी द्दैत की धरना टूटने से अहंकार चूर चूर हो जाता है।
=> कही लोग एस़ा कहते है की हम दीवार को जानते है। दीवार हमें नहीं जानती। हम शरीर को जानते है,शरीर हमें नहीं जानता। यह अज्ञान की भाषा है।
=> ज्ञानी ऐसा नहीं कहते,क्योकि उनकी दृष्टी में अस्तित्व के सिवा दूसरा है ही नहीं। तुम अस्तित्व का हिस्सा हो। कही लोग जड़ को सोया हुआ चेतन कहते है। यह बात गलत है, चेतन कभी सोता नहीं। इसलिए तो उसे चेतन कहते है। अस्तित्व के में तार्किक और बुद्धि के बल पर चलनेवाले भटक जाते है।उनके पास समाधान नहीं है।उनके भरोशे मत रहेना। मंजिल कभी भी नहीं मिलेगी। तूम अज्ञानी हो ऐसा सोचना ही अज्ञान है। तुम ज्ञान-स्वरूप हो सत्संग में सदगुरु कहते है की तूम कौन हो,कहा हो और कैसे हो।शिष्य की समज में नहीं आता।बिद्धि कुंठित हो जाती है। सदगुरु के पास भी जवाब नहीं है। फिर भी उसका समाधान करने का सामर्थ्य सदगुरु में अवश्य है। सदगुरू कहते है की तुम ज्ञान पाने के लिए तुम्हारा जो है उसे गुरु चरण में समर्पित कर दो। यह अजोड युक्ति है।शिष्य जब दृढ़ संकल्प कर लेता है,तब उसके पास कोई शब्द नही है। नि:शब्द स्थिति हो गई। फिर भी भीतरी दिया प्रकट हो गया। मै कौन हूँ।कहा हूँ, कैसा हूँ,सारे प्रश्न मिट गए, शिष्य के साथ भी गुरु चल बसा, मर गया,मारना ही सदगुरु का पेशा है। स्मशान मै जिंदा आदमी जलता है। मुर्दे को पता नहीं की मै मरा हूँ या जीता हूँ। सारे सवाल ज़िंदा आदमी को होते है। मुरदे ऐसा नहीं कहते की मै अमर हूँ। अकर्ता-अभोकता हूँ। अब कुछ होनेवाला नहीं है। कैसे हो सकता है? इस जानकारी के लिए तुम्हे मरना होगा। उपदेश देने के लिए सदगुरु को मरकर ज़िंदा होना पड़ता है। अब भीतरी बदलाव आ गया। बीज दिखाई पडेगा फिर भी भीतर अंकुर जल गया है। अब पेड़ होने की संभावना नहीं है। उसे जीवन्मुक्त कहते है। अब कोई उम्मीद नहीं है।
=> तुम अपने में परिपूर्ण हो। आपने कही शास्त्र में पढ़ा होगा या सूना होगा की इश्वर है। किसे ईश्वर कहते है? कैसा है और कहाँ है। पहला प्रश्न इश्वर किसे कहते है? ईश्वर देश, काल, वास्तु से परे है। मेरा कहने का मतलब यह नहीं है की ईश्वर और जगत इश्वर और तुम दो हो। सारा विश्व इश्वर में ही समा जाता है। जैसे बूंद सागर में समाती है। तुम तुम नहीं हो,तुम और इश्वर में कोई भेद नहीं है, स्वयं ज्ञान-स्वरूप अस्तित्व तुम हो। जगत जगत नहीं है। इश्वर है। माया माया नहीं है, ईश्वर है। जिव जिव नहीं है इश्वर के सिवा कुछ है ही नहीं। कथनभेद वस्तुभेद नहीं है।अब सवाल है की ईश्वर कहाँ है? ईश्वर ही है इश्वर के सिवा कुछ है ही नहीं। कहा है ऐसा कहना ठीक नहीं है। जैसे शक्करमे मीठापन पूर्ण रूप से है, ऐसे परमात्मा व्यापक है। ईश्वर ही अस्तित्व है और अस्तित्व तुम हो। तुम बोलते हो फिर भी सदा मौन हो। तुम देखते हो फिर भी नहीं देखते। चलते हो फिर भी नहीं चलते। इस गूढ़ रहस्य को जिसने पा लिया वह नि:संशय हो गया। उसे पूर्ण दर्शन कहते है। वह तुम हो।
=> तुम अपने में परिपूर्ण हो। आपने कही शास्त्र में पढ़ा होगा या सूना होगा की इश्वर है। किसे ईश्वर कहते है? कैसा है और कहाँ है। पहला प्रश्न इश्वर किसे कहते है? ईश्वर देश, काल, वास्तु से परे है। मेरा कहने का मतलब यह नहीं है की ईश्वर और जगत इश्वर और तुम दो हो। सारा विश्व इश्वर में ही समा जाता है। जैसे बूंद सागर में समाती है। तुम तुम नहीं हो,तुम और इश्वर में कोई भेद नहीं है, स्वयं ज्ञान-स्वरूप अस्तित्व तुम हो। जगत जगत नहीं है। इश्वर है। माया माया नहीं है, ईश्वर है। जिव जिव नहीं है इश्वर के सिवा कुछ है ही नहीं। कथनभेद वस्तुभेद नहीं है।अब सवाल है की ईश्वर कहाँ है? ईश्वर ही है इश्वर के सिवा कुछ है ही नहीं। कहा है ऐसा कहना ठीक नहीं है। जैसे शक्करमे मीठापन पूर्ण रूप से है, ऐसे परमात्मा व्यापक है। ईश्वर ही अस्तित्व है और अस्तित्व तुम हो। तुम बोलते हो फिर भी सदा मौन हो। तुम देखते हो फिर भी नहीं देखते। चलते हो फिर भी नहीं चलते। इस गूढ़ रहस्य को जिसने पा लिया वह नि:संशय हो गया। उसे पूर्ण दर्शन कहते है। वह तुम हो।