=>> यह सूत्र बड़ा गहन है। इसका रहस्य जानने के लिए सदगुरु की कृपा आवश्यक है। कर्म उपासना याने ग्रंथ पढ़ने से नहीं पाया जाता। नादी और नाद का अंतर तुटने पर तुम पूर्णता को उपलब्ध हो सकते हो। जो सुनाई पड़ता है। उसीमे सुननेवाला समा जाता है। इस असली नाद को सुनने के लिए इन्द्रिय काम आनेवाली नहीं है। बुध्धिगम्य नहीं है। में जिस नाद की बात कर रहा है वो नाद विश्व का आधार जानो उस नाद निमित हो कर अनंत ब्रह्मांड की रचना करता है। और उपादान कारण भी नाद है। ओमकार की उत्तपति स्थान भी वो नाद है। उस नाद को हम अस्तित्व कहते है। वो स्वयं है न उसकी उत्त्पति है। न स्थिति है और न उसी का अंत है। वो कभी कुछ हुआ ही नहीं और होनेवाला भी नहीं,अपरिणामी अखंड और अद्वेत जानो। वो नाद अनंत रुपसे से भासित होने पर भी अपने महिमा में यथार्थ रूप से स्थित है। सर्वरूप और सर्व से पर इस नाद का असली स्वरूप जानो। उस नाद को पाना नहीं है। तुम इस नाद का हिस्सा हो। आप का वियोग हुआ ही नहीं योग कैसे किया जाय ? आप योगी है और रहेंगे। इस नाद को अनंत नाम से पुकारा जाता है। ब्रम्ह,इश्वर,चैतन्य ,अस्तित्व,ओमकार आनंद सत्य सारे विशेषण उसीका जानो।उस नाद से ऐकोहम बहुश्याम संकल्प से अनंत ब्रह्मांड के रूप में प्रगट हुआ हो। ऐसा श्रुति प्रमाण जानो। उस नाद का वरन करता है। उसी के सामने यथार्थ रूपसे प्रगट हो जाता है। सदगुरु एक माध्यम है। उसके सिवा आप इस रहस्य को पाना बड़ा मुश्किल जानो। आखिरी रहस्य पाने से तुम और सदगुरु नाद के रूप में दिखाई पडते है। ऐ है जीवन का अंतिम लक्ष्य उसके आगे जानने के लिए कुछ,शेष बचता ही नहीं उसे हम पूर्ण दर्शन कहते है।
=>> सदगुरु कृपा ही केवलम।
=>> सदगुरु कृपा ही केवलम।