( ग्रन्थकर्ता का परिचय )
=> सदगुरु कृपा ही केवलं। मेरा वतन है उ. गुजरातके महेसाणा जिले का एक छोटा सा गोंव उबखल वही मेरी जन्मभूमी और कर्मभूमि रहा है। उबखल मे एक अल्प साधन गरीब प्रजापति परिवार में मेरा जन्म हुआ।पिता का नाम जेठी राम और माता का नाम था हेमकोरबा। पिता भक्ति संस्कार से संपन्न ,भोले साफ हदय और सरल स्वभाववाले थे। माता भी शांत स्वभाववाली,संतुष्ट,विचारशील और भावना की मूरत थि। सहनशीलता उसका विशिष्ट गुण था।
=> पिताश्री और मातृश्री निरांत पंथ में दिक्षित हुए थे। उनके गुरु थे रिद्रोल (ता. माणसा ) निवाशी प.पु श्री मणीरामजी महाराज। मेरे पिताश्री का देहावसान दि. २५ -१-२००६ के रोज हुआ था और मातृश्री का देहविलय ३० -१०-२०१० के दिन हुआ। हमारा परिवार बड़ा है सभी भाइयो में सबसे बड़ा हु। मेरी पढाई उबखल से निकटतम बड़े गॉव कुकरवाडा में हुइ। वर्हा आठवी कक्षा तक पढाई हुइ। तभी शाला के आचार्य ने मै बेकसूर होते हुए भी मेरी पिटाई की। इस अपमान को सह नहीं सका और वही से मैंने पढाई छोड़ दी और पिताश्री के पारिवारिक धंधे के वही काम में हाथ बटाने लगा।
=> उबखल से निकट ही एक गॉव है पिलवाई। वर्हा के एक प्रजापति परिवार की बेटी पार्वती के साथ, छोटी उम्र में ही मेरी शादी हुई।हमारा गृहस्थ जीवन भक्ति भाव से भरा हुआ था। दाम्पत्य-यात्रा में तीन बेटे और एक बेटी हमें प्राप्त हुए। बेटो के नाम है नरेश , राजू और रोहित. बेटी का नाम रमिला। आनन्द से हमारा जीवन बीत रहा था की सौभाग्य से एक दिन उसमे नया मोड़ आया।
=> एक दिन हमारे गॉव में पु.श्री मणीरामजी महाराज पधारे।उनके भजन सत्संग का लाभ लेने के लिए मै भी गया। सत्संग के दौरान महाराज श्री ने कहा." परब्रह्म परमात्मा व्यापक है, सचराचर उससे परिपूर्ण है। उसे पाने के लिए 'में कौन हु?' 'कहा से आया हु?' 'मेरा स्वरूप क्या है?'- इन प्रश्नों का ज्ञान पाना आवश्यक है' यह सुनते मै सोच मै पड़ गया। मेरी उम्र तब २१ की थि. गीता,भागवत आदि का पठन मैं ने किया था। लेकिन ये सारी बाते मेरी समज से बहार थी।
=> मैंने महाराजश्री से कहा की मैंने कही पढ़ा है की परमात्मा मन,बुध्धि और वाणी से परे है-फिर उनके अपरोक्ष स्वरूप को आप हमे किस प्रकार समजा सकते है? महाराजश्री ब्रम्हनिष्ठ थे।बहुश्रुत भी थे। वे बोले ,'हम आपको अगम-अगोचर-परब्रह्म परमात्मा का अपरोक्ष रूप से ज्ञान दे सकते है,लेकिन तुम्हे हमारे वचन का पालन करना होगा।'
=> मैंने कहा, 'आत्मज्ञान पाने के लिए मुझे आपकी हर शर्त मंजूर है।' तब महाराजश्री हमें बोध करने पर राजी हो गये।वह दिन था ३० जनवरी, १९७२। निरांत पंथ की परम्परानुसार हमने बोध लिया। सुबह उठते ही मुझ पर ज्ञान का नशा छा गया। मुझे नया जीवन मिल गया। उस अवर्णनीय घटना का वर्णन करने के लिए हमारे पास शब्द नहीं है।अब मन मै कोई प्रश्न नहीं बच पाया था।बस,समाधान था,समर्पण था।सदगुरु ही अब मेरे लिए सब कुछ थे। लेकिन यह खुमार टिक सका नहि।
=> समय की धारा में हम बहते गये। गृहस्थ जीवन की गुत्थियो में उलझते गये। बच्चे बड़े होने लगे थे। उनका पालन-पोषण, पढाई-लिखाई,घर-गृहस्थी आदि के खर्च को जुटाने में हमारा सारा समय व्यतीत होने लगा भजन-सत्संग में जाना मुस्किल हो गया।.सामाजिक व्यवहारों की वास्तविकता हम पर हावी होती चली गई।फिर भीतर ज्ञान की चिंगारी जलती रही।. जीवन की वास्तविकता इतनी कठोर थी की कभी कभी दौ जून भोजन जुटाना भी मुस्किल हो गया। पैसे जुटाने की तो कल्पना करना भी मुस्किल था।फिर भी श्रधा-विश्वास के बल पर हमारी ज्ञान-निष्ठां अडिग रही।
=> ऐसे विकट समय में भी हमने अपना गृहस्थ-धर्म अच्छी तरह निभाया। बादमे एक दिन सद्गुरु महाराज का बुलावा आया और हम उनकी आध्यात्मिक यात्रा-भजन-सत्संग आदि में प्रवृत हो गए। जब में गुरूजी से मिलता तब मूक हो जाता था।बोल नहीं पता था। सत्संग के दौरान अंतमुख हो जाता था। यह देखकर महाराजश्री ने कहा, -'तुम पूर्ण हो गये।'तब से मैंने अपना नाम "पूरण" रख दिया। उसे गुरु-प्रसाद समजकर स्वीकार कर लिया। वो तो सद्गुरु के नाम में ही सारे नाम समा जाते है।
=> आखिर संतो भक्तो की साक्षी में सद्गुरु महाराज ने हमें आचार्य -पद का अधिकार दिया। तब से मुमुक्षुओं तक सदगुरु का पयगाम पहुचने के लिए गुरु-आज्ञा से बोध देने का धर्म निभाना शुरू किया। में तो संतो का दास हूँ और रहूँगा। फिर भी मेरे जीवन के दो उद्देश्य है-सेवा और सत्संग। अब अंतिम साँस तक गुरुगुण गाना ही जीवन का लक्ष्य हो गया है।
गूंगे को बानी दिये,बधिर को दिए कान ।
अंधे की गुरु आँख है ,पूरण गुरु की सान।।
'पूरण' महाराज
'पूरण' महाराज
मु: उबखल , ता: विजापुर
जि: महेसाणा
मो : 99988 90688