Jay Ambe

ज्ञान के सूत्र

(१) दुसरे पर अंगुली उठानेवाला आदमी आज़ाद नहीं हो सकता ।

(२ ) तुम्हारे व्यक्तित्व का गवाह तुम्हारी वाणी है ।

(३) खुद को सुननेवाला आदमी सच्चा जीवन पता है ।

(४) तुम्हारी मंजिल चुने हुए सही रस्तेपर निर्भर है ।

(५) क्षमा संत पुरुष का भूषण है । करुणा स्वभाव है ।

(६) दुसरो के दू:ख पर उत्सव माननेवाला आदमी भक्त नहीं हो सकता ।

(७) स्वीकृति पूर्णता की निशानी है ।

(८) मन की बीमारी का इलाज केवल सत्संग है ।

(९) प्रेम और घृणा दोनों एक साथ नहीं रह सकते ।

(१०) नफ़रत की आग प्रेम के पानी से बूजाई जा सकती है ।

(११) विजयी होना सरल है । हारना मुस्किल है । हारा हुआ आदमी विजयी होता है ।

(१२) खोजनेवाला आदमी भटक जाता है । खुद में खोना परम सन्ति का धाम है ।

(१३) अशांति की भ्रांति मिटाना शांति का उपाय है ।

(१४) अपनी मुर्खता का ज्ञान ही सच्ची सर्वज्ञता की निशानी है ।

(१५) जिसकी दृष्टी में प्रेम है,वह सदा निरोगी है ।

(१६) इष्ट में दोष देखनेवाला और इष्ट की निंदा सुननेवाला आदमी समर्पित नहीं हो सकता ।

(१७) मीठा खाने वाली जिह्वा मीठा बोलने से मधुर लगती है। मधुर वाणी श्रेष्ठ भूषण है ।

(१८) बिना संतोष विश्राम नहि । संतोष धन अनमोल, "पूरण" तृष्णा अभागिनी हरी से न हुआ मेल ।।

मैं ही मैं हूँ

=> ना मैं पुरुष हूँ।ना मैं स्त्री हूँ।ना मैं हिंदू हूँ।ना मैं मुसलमान हूँ।ना मैं इसाई हूँ,ना मैं किसी का बेटा हूँ। ना कोई मेरा बाप है , ना मेरा कोई रिस्तेदार है। ना मेरा कोई धर्म है। ना मेरा कोई पंथ है।ना मेरा कोई संप्रदाय है। ना मैं शरीर।ना मेरा शरीर है। ना मैं आया हूँ,ना मैं जाऊँगा।ना मेरा लोक है , ना मेरा परलोक है।  ना मैं मानव हूँ, ना मैं दानव हूँ। ना मैं कोई देव हूँ , ना मेरी उत्पति है। ना मेरी स्थिति है। ना मेरा लय है। ना मेरा कोई गुरु है। ना मैं किसी का चेला हूँ। ना जिया हूँ, ना मैं मरूँगा। ना मैं द्रष्टा हूँ,ना मैं साक्षी हूँ। ना मैं धता हूँ,ना मैं ज्ञाता हूँ। ना मैं स्त्रष्टा हूँ। ना मैं अल्पज्ञ हूँ। ना मैं सर्वज्ञ हूँ। ना मैं शब्द हूँ,ना मैं बानी हूँ, ना मैं ओमकार हूँ,ना मैं प्रेरक हूँ। ना मैं ज्योति हूँ,ना मैं ध्यानी हूँ। ना मैं त्यागी हूँ,ना मैं भोगी हूँ। ना मैं वैरागी हूँ।ना मैं संन्यासी हूँ। ना मैं हंस हूँ,ना मैं परमहंस हूँ। ना मैं पुरुषोतम हूँ। ना मैं ज्ञानी हूँ,न मैं विज्ञानी हूँ, ना मैं भौतिक हूँ,इन विशेषणों से मैं पर हूँ।


मुझे मत पूछो,मैं क्या हूँ ?
उतर : हमारा एक है बस मैं ही मैं हूँ।
अनुभव हमार होता नहीं है।
उतर : हमारा एक है। बस मै ही मैं हूँ।
क्या ढूँढूँ मैं आपको,कहीं ना मिलूँगा मैं। 
मिलना बिछडना सब फोक है। बस मैं ही मैं हूँ।
सवाल वो करता है,जो खुद को ना पाया।
उतर : उसे कहते सवाल, बच ना पाया।
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: